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देश / आम आदमी का बजट इन दिनों पूरी तरह से चरमरा चुका है। रसोई की थाली से लेकर हाथ के मोबाइल तक और ऑफलाइन बाजार से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग के कार्ट तक—हर जगह सिर्फ एक ही चीज़ तेज़ी से बढ़ती दिख रही है, और वो है महंगाई। डिजिटल इंडिया और आर्थिक प्रगति के बड़े-बड़े दावों के बीच आम नागरिक यह समझने पर मजबूर है कि उसकी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा आखिर जा कहाँ रहा है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतें और रोजमर्रा के सामान का गणित
ईंधन के दाम केवल गाड़ियों तक सीमित नहीं रहते। जब-जब पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छूती हैं, उसका सीधा असर भाड़े और माल ढुलाई पर पड़ता है। नतीजतन, सब्जी मंडी से लेकर घर के राशन तक हर सामान महंगा हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेना कोई हल नहीं है; जनता यह जानना चाहती है कि करों (Taxes) का जो भारी-भरकम बोझ उस पर डाला गया है, उसमें राहत कब मिलेगी?
डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक्स पर भी महंगाई का साया
सिर्फ खाने-पीने की चीजें ही नहीं, बल्कि आम आदमी की जरूरत बन चुके मोबाइल, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक्स भी लगातार महंगे हो रहे हैं। रिचार्ज प्लान्स की बढ़ती कीमतों ने हर घर का मासिक बजट बिगाड़ दिया है। एक तरफ सरकार हर सेवा को डिजिटल करने पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी तरफ डिजिटल एक्सेस को ही महंगा बनाया जा रहा है।
ऑनलाइन शॉपिंग और ऑफलाइन बाजार: दोनों जगह जनता पस्त
पहले लोग राहत की उम्मीद में ऑनलाइन डिस्काउंट खोजते थे या स्थानीय दुकानों में मोल-भाव कर लेते थे। लेकिन अब स्थिति यह है कि सप्लाई चेन की लागत और इनडायरेक्ट टैक्स के चलते ऑनलाइन और ऑफलाइन—दोनों ही बाजार आम खरीदार की पहुंच से बाहर होते दिख रहे हैं। छोटे व्यापारी भी कम बिक्री और बढ़ती लागत से परेशान हैं, जबकि ग्राहक बढ़ती कीमतों के कारण खरीदारी से हाथ खींच रहा है।
नीतिगत जवाबदेही कब तय होगी?
जनता केवल आंकड़ों का खेल नहीं देखना चाहती। सरकार और नीति-निर्माताओं की यह जिम्मेदारी है कि वे केवल राजस्व जुटाने पर ध्यान न दें, बल्कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए कड़े और प्रभावी कदम उठाएं। प्रशासनिक स्तर पर कालाबाजारी को रोकना, बुनियादी चीजों पर टैक्स दरों की समीक्षा करना और आम उपभोक्ता को सीधी राहत पहुंचाना अब वक्त की सबसे बड़ी मांग है।
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