शिक्षक नहीं, राष्ट्र निर्माता! बिरसा मुंडा छात्रावास में आचार्यों ने लिया 'युगानुकूल परिवर्तन' का ऐतिहासिक संकल्प

 


क्या आपको लगता है कि आज के इस आधुनिक तकनीक और भारी प्रतिस्पर्धा के युग में सिर्फ पुरानी और रटी-रटाई स्कूली शिक्षा से हमारे बच्चों का भविष्य पूरी तरह से संवर सकता है? बिल्कुल नहीं, और इसी कड़वे सच को एक नई और सकारात्मक दिशा देने के लिए सियरमऊ के बिरसा मुंडा जनजाति बालक छात्रावास में एक ऐसा शानदार कदम उठाया गया है जो शिक्षा की पूरी तस्वीर बदल सकता है! दरअसल, यहाँ आयोजित 'नवीन आचार्य विकास वर्ग' के एक बेहद ऊर्जावान और ऐतिहासिक उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता श्री हरीश शर्मा जी ने "युगानुकूल परिवर्तन" के ज्वलंत विषय पर एक ऐसा प्रेरक और आँखें खोल देने वाला उद्बोधन दिया जिसने वहां मौजूद हर एक व्यक्ति को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने बिना किसी झिझक के साफ शब्दों में यह स्पष्ट किया कि आज के समय में शिक्षा केवल चार दीवारों के भीतर किताबी ज्ञान बाँटने का कोई साधारण जरिया नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर एक मजबूत समाज और एक सशक्त, अखंड राष्ट्र के निर्माण का सबसे शक्तिशाली और अचूक साधन है। जरा सोचिए, अगर हमारे आचार्य और गुरुजन ही समय की रफ्तार के साथ खुद को नहीं बदलेंगे, तो हमारे युवा कैसे दुनिया से कदम मिला पाएंगे? इसी तेजी से बदलती परिस्थितियों, नई तकनीकी प्रगति और आज के समाज की आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए श्री शर्मा ने इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि हमारे शिक्षकों यानी आचार्यों को अब खुद के भीतर समय के अनुसार एक बड़ा और युगानुकूल बदलाव लाना ही होगा। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम की सबसे खास और ध्यान खींचने वाली बात यह रही कि उन्होंने यह बदलाव अपनी जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि अपनी महान भारतीय संस्कृति, हमारे सदियों पुराने उच्च नैतिक मूल्यों और हमारी गहरी राष्ट्रीय चेतना को पूरी तरह से सुरक्षित और अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक शिक्षण पद्धतियों को अपनाने की बात कही, जो यकीनन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। एक शिक्षक सिर्फ ज्ञान नहीं देता, बल्कि वह एक पूरी नई पीढ़ी का निर्माण करता है, और इसी अहम बात को रेखांकित करते हुए उन्होंने नवीन आचार्यों का पूरे जोश के साथ आह्वान किया कि वे अपने खुद के आचरण, अपने व्यवहार और अपनी बेहतरीन शिक्षण शैली के जरिए हर एक विद्यार्थी के मन में गहरे संस्कार, कड़ा अनुशासन, अटूट आत्मविश्वास और सबसे बढ़कर सच्ची राष्ट्रभक्ति का भाव विकसित करें। उनका स्पष्ट मानना था कि जब एक आचार्य खुद एक जीता-जागता आदर्श बन जाता है, तभी समाज में एक असली और सकारात्मक परिवर्तन आता है। इस ज्ञानवर्धक कार्यक्रम के दौरान वहां मौजूद आचार्यों ने भी पूरे उत्साह के साथ अपनी कई जिज्ञासाएँ और सवाल सामने रखे, जिनका श्री शर्मा जी ने बहुत ही सारगर्भित तरीके से समाधान किया, जो सभी प्रशिक्षार्थियों के लिए एक बहुत बड़ा प्रेरणास्रोत बन गया। इस भव्य उद्घाटन सत्र में प्रबंध समिति के पदाधिकारी, वर्गाधिकारी और प्रशिक्षार्थी आचार्यगण मौजूद रहे, और अंत में आभार व्यक्त करते हुए वर्ग संचालन समिति ने सभी से एक बहुत ही शक्तिशाली संकल्प लेने का आग्रह किया कि आज मिले इस बहुमूल्य मार्गदर्शन को वे सिर्फ सुनकर भूल नहीं जाएंगे, बल्कि अपने जीवन और अपने रोजमर्रा के शिक्षण कार्य में पूरी तरह से उतारेंगे!



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