जहां दौड़ने थे खिलाड़ी, वहां बंध रहे मवेशी! सिलवानी स्टेडियम की चौंकाने वाली हकीकत

80 लाख का स्टेडियम बना तबेला!

7 साल बाद भी खिलाड़ियों को नहीं मिला मैदान



सिलवानी, रायसेन (कृष्ण कांत सोनी) । करीब 80 लाख रुपये की लागत से बनाया गया मिनी खेल स्टेडियम आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जिस स्टेडियम में खिलाड़ियों की दौड़, अभ्यास और प्रतियोगिताएं होनी थीं, वहां आज मवेशी बांधे जा रहे हैं। सात साल बीत जाने के बाद भी स्टेडियम किसी विभाग को हैंडओवर नहीं किया गया और सरकारी संपत्ति धीरे-धीरे खंडहर में बदलती जा रही है।

🏟️ 80 लाख खर्च 7 साल इंतजार 0 खिलाड़ी ✔ मवेशियों का तबेला

कैसे शुरू हुई पूरी कहानी?

सिलवानी-गैरतगंज स्टेट हाईवे स्थित ग्राम जुनिया में ग्रामीण क्षेत्र के खिलाड़ियों को आधुनिक खेल सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आरईएस विभाग द्वारा मिनी खेल स्टेडियम का निर्माण कराया गया था। निर्माण पूरा होने के बावजूद स्टेडियम का संचालन शुरू नहीं हो पाया क्योंकि इसे आज तक किसी विभाग को विधिवत हैंडओवर नहीं किया गया।

अब स्टेडियम की हालत क्या है?

देखरेख नहीं होने के कारण स्टेडियम के कमरों में मवेशी बांधे जा रहे हैं। कई जगहों पर भूसा रखा गया है। बिजली की फिटिंग चोरी हो चुकी है। दरवाजे और टाइल्स उखाड़ लिए गए हैं। शौचालय क्षतिग्रस्त पड़े हैं तथा परिसर में असामाजिक गतिविधियों की शिकायतें भी सामने आई हैं।

📌FACTS
  • ₹80 लाख की लागत
  • करीब 7 साल पहले निर्माण
  • आज तक हैंडओवर नहीं
  • कमरों में मवेशी
  • बिजली फिटिंग चोरी
  • दरवाजे और टाइल्स क्षतिग्रस्त
  • शौचालय बदहाल

खिलाड़ियों के सपनों पर ताला

सिलवानी क्षेत्र के कई खिलाड़ी राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर जिले का नाम रोशन कर चुके हैं। इसके बावजूद स्थानीय खिलाड़ियों के पास न पर्याप्त खेल सुविधाएं हैं, न बेहतर मैदान और न ही नियमित कोच की सुविधा उपलब्ध है। खिलाड़ियों का कहना है कि स्टेडियम बनने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि अब हालात बदलेंगे, लेकिन सात साल बाद भी मैदान बंद पड़ा है।

"हमारे यहां न अच्छा मैदान है, न कोच और न पर्याप्त सुविधाएं। स्टेडियम बनने के बाद उम्मीद थी कि सब बदलेगा, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ।"

सिलवानी विधायक देवेंद्र पटेल ने क्या कहा?

स्थानीय विधायक देवेंद्र पटेल ने इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि खिलाड़ियों के साथ अन्याय हो रहा है। उन्होंने कहा कि छह-सात साल पहले बना स्टेडियम आज तक शुरू नहीं होना गंभीर लापरवाही है और इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया जाएगा।

⚠️ बड़ा सवाल 80 लाख खर्च हुए... स्टेडियम बना... लेकिन जिम्मेदार कौन?

सबसे बड़ा सवाल

जब सरकारी खजाने से 80 लाख रुपये खर्च किए गए, तब इस स्टेडियम की जिम्मेदारी किसकी थी? आखिर सात साल तक खिलाड़ियों को उनके अधिकार से क्यों वंचित रखा गया? और कब तक खिलाड़ियों के सपने फाइलों में कैद रहेंगे?

📢 SDM सिलवानी का बयान
"इसके संबंध में आपने जो बताया है कि यह पंचायत ने हैंडओवर नहीं किया है। इसके संबंध में मुझे अभी अपडेट जानकारी नहीं है। मैं इसका पता कराऊंगी और फिर आगे क्यों नहीं उसका उपयोग हो पा रहा है, उसकी भी जांच करेंगे।"
— अलका सिंह
SDM, सिलवानी
📢 जनपद CEO सिलवानी का बयान
"

स्टेडियम का निर्माण आरईएस विभाग द्वारा कराया गया था और आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर इसे जल्द शुरू कराने का प्रयास किया जाएगा।

"
— नीलम रैकवार
CEO,जनपद सिलवानी
🎙️ पूर्व सरपंच का बड़ा दावा
"उसपे घटिया निर्माण हुआ है, निर्माण पूर्ण नहीं हुआ, क्षतिग्रस्त पड़ा है और उसे कई बार हैंडओवर देने के लिए हम पर दबाव बनाया गया। कुछ लालच भी दिया गया कि आप हैंडओवर ले लीजिए, लेकिन घटिया निर्माण बच्चों के भविष्य से जुड़ा मामला था, इसलिए हमने उसे हैंडओवर नहीं लिया। जब तक निर्माण ठीक नहीं होगा, तब तक हम हैंडओवर नहीं लेंगे।"
⚠️ सरपंच का दावा 🏟️ स्टेडियम में मवेशी घूम रहे हैं
🐄 कमरों में मवेशी बांधे जा रहे हैं
🍺 परिसर में शराब पीने की भी बात कही गई
📉 स्टेडियम की स्थिति बेहद खराब और दयनीय बताई
— सफीक मुंशी
पूर्व सरपंच, जुनिया
⚽ खिलाड़ी दानिश की जुबानी
"यहाँ कोई सुविधा नहीं है। हम सिर्फ खेलने आते हैं। न पीने के पानी की व्यवस्था है, न कोई दूसरी सुविधा। गेट भी टूटे हुए हैं। 80 लाख रुपये की लागत से स्टेडियम बना, लेकिन सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है। यहाँ कोई प्रतियोगिता नहीं होती, सिर्फ हम बच्चे अपने स्तर पर खेलते हैं। शासन की ओर से कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है, न कोई स्पोर्ट्स टीचर है। मजबूरी में यहाँ खेलने आना पड़ता है, क्योंकि सिलवानी में हमारे पास दूसरा मैदान नहीं है। हम लगभग 3 किलोमीटर दूर से यहाँ खेलने आते हैं।"
📌 खिलाड़ी की प्रमुख बातें 🏟️ स्टेडियम में कोई मूलभूत सुविधा नहीं
🚰 पीने के पानी की व्यवस्था नहीं
🚪 गेट क्षतिग्रस्त
👨‍🏫 स्पोर्ट्स टीचर नहीं
⚽ प्रतियोगिताएँ नहीं होतीं
🚶 3 किलोमीटर दूर से खेलने आते हैं
— दानिश
स्थानीय खिलाड़ी, सिलवानी
🖋️ केके की कलम से | विश्लेषण


80 लाख रुपये... सात साल का इंतज़ार... और नतीजा—स्टेडियम नहीं, तबेला! यह सिर्फ एक सरकारी भवन की बदहाली नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर है जहाँ योजनाएँ कागज़ों पर पूरी हो जाती हैं, लेकिन ज़मीन पर दम तोड़ देती हैं। अगर निर्माण में खामियाँ थीं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अगर हैंडओवर नहीं हुआ तो सात साल तक रखरखाव किसकी जिम्मेदारी थी? और अगर खिलाड़ियों के लिए बनाया गया स्टेडियम आज मवेशियों और असामाजिक गतिविधियों का अड्डा बन गया है, तो यह सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता का मामला है। सबसे बड़ा नुकसान उन युवाओं का हुआ है, जिनके सपनों को सुविधाओं के अभाव में कुचल दिया गया। अब बहानों का नहीं, जवाबदेही का समय है। दोष तय हों, जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो और स्टेडियम को तत्काल खिलाड़ियों के लिए शुरू किया जाए। क्योंकि खिलाड़ियों को वादे नहीं, मैदान चाहिए।

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