
सुना है रायसेन जिले की सिलवानी तहसील के सियरमऊ गांव में इन दिनों हवाओं में धूल के साथ-साथ एक खास तरह की कानाफूसी भी खूब उड़ रही है। चौक-चौराहों पर चर्चा है कि दिल्ली वाले साहब यानी पीएम मोदी ने तो हर घर जल का जो शानदार सपना देखा था, उसे यहां के कुछ 'खास' लोगों ने मटियामेट करने की पूरी सुपारी ले ली है। बताने वाले बताते हैं कि लाखों रुपये पानी की तरह बहाकर जो नल-जल योजना शुरू की गई थी, वह अब खुद पानी की एक-एक बूंद को तरस रही है, और ग्रामीणों के मुताबिक पिछले दो हफ्तों से नलों से पानी की जगह सिर्फ ठंडी हवा के झोंके और सिस्टम की नाकामी की गूंज निकल रही है। अंदरखाने की खबर यह भी है कि इस पूरे ड्रामे के पीछे एक बड़ा 'बिल-विस्फोट' छिपा है; सूत्रों के मुताबिक बिजली विभाग ने लाखों का ऐसा तगड़ा करंट वाला बिल थमाया है कि ठेकेदार के पसीने छूट गए हैं और अब दोनों के बीच यह असमंजस बना हुआ है कि आखिर इस भारी-भरकम बिल का मटका किसके सिर फूटेगा! मजे की बात तो यह है कि पानी की टंकी अभी भी उसी ठेकेदार के अंडर में बताई जा रही है, जो फिलहाल जिम्मेदारी लेने से कतरा रहे हैं। उधर, बिजली विभाग अपनी मनमानी के झंडे गाड़ रहा है और PHE विभाग की कुंभकर्णी नींद तो ऐसी है कि मानो उन्हें गांव वालों के सूखे गलों से ज्यादा अपने दफ्तरों की शांति प्यारी हो। प्यास से बेहाल ग्रामीण रोज सुबह उठकर सूखे नलों को निहारते हैं और सोचते हैं कि क्या कभी उनका पानी वापस आएगा या फिर कागजों पर ही नदियां बहती रहेंगी। इस पूरी बंदरबांट और मिलीभगत के खेल ने सियरमऊ को एक ऐसे प्यासे रेगिस्तान में बदल दिया है, जहां सिस्टम मजे से 'पासिंग द पार्सल' खेल रहा है; ऐसे में बड़ा सस्पेंस यह है कि आखिर यह नींद टूटेगी भी या सियरमऊ ऐसे ही प्यासा मरेगा?
केके के 3 तीखे सवाल:
- जब नल-जल योजना पर लाखों का बजट पास हुआ था, तो क्या ठेकेदार और बिजली विभाग के बीच बिल भरने का कोई 'गुप्त समझौता' नहीं हुआ था, या सारा पैसा शुरू में ही पानी में बह गया?
- दो हफ्ते से सियरमऊ की जनता बूंद-बूंद को मोहताज है, तो PHE विभाग के आला अधिकारी आखिर किस 'शुभ मुहूर्त' का इंतजार कर रहे हैं?
- क्या पीएम मोदी का 'हर घर जल' का सपना सियरमऊ में सिर्फ कागजी फाइलों और ठेकेदारी प्रथा की भेंट चढ़कर रह जाएगा, या प्रशासन इस 'तीन के तिगाड़े' की जिम्मेदारी तय करेगा?
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