सिलवानी थाना: ट्रांसफर के पीछे क्या है असली कहानी? पूनम सविता के बाद अब संजीत परते की अग्निपरीक्षा!

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किसी ने सच कहा है कि “किसी के जाने से कहानी खत्म नहीं होती जनाब, असली सवाल ये है कि अगला किरदार उसे किस मोड़ पर ले जाता है…” सिलवानी थाने की कुर्सी बदली है, लेकिन चर्चा है कि मामला सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं, बल्कि अंदरखाने चल रही हलचल का भी है—सूत्रों के मुताबिक पूनम सविता का कार्यकाल ऐसा रहा जहां ‘दाल गलने’ नहीं दी गई, जागरूकता पर खास जोर रहा और कई बार विरोध के बावजूद उन्होंने अपने फैसलों से पीछे हटना मंजूर नहीं किया; बताते हैं कि उनके स्थानांतरण को लेकर विरोध कई बार हुआ, और एक बार तो भाजपा के लगभग सभी कद्दावर नेता सड़क पर बैठ गए, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने काम की रफ्तार नहीं बदली—अब वही कुर्सी संजीत परते के पास है, और चर्चा है कि उनके सामने ‘आग का दरिया’ पार करने जैसी चुनौती है, क्योंकि हाल के महीनों में माहौल संवेदनशील रहा और अलग-अलग वर्गों के बीच भरोसे की डोर कमजोर बताई जा रही है; बताने वाले बताते हैं कि यह फेरबदल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि कई अनकहे समीकरणों का नतीजा भी हो सकता है—हालांकि दोनों ही अधिकारियों के पक्ष में अपनी-अपनी बातें हैं, कोई सख्ती और ईमानदारी की मिसाल देता है तो कोई नए प्रभारी से संतुलन और संवाद की उम्मीद लगाए बैठा है; अब देखना यह है कि नई कमान हालात को किस तरह साधती है और क्या पुराने विवादों की परछाई आगे भी असर दिखाएगी या कहानी यहां से नया मोड़ लेगी… और अंत में “किसी की जीत लिखी है, किसी का इम्तिहान अभी बाकी है… सिलवानी की कहानी में, असली मोड़ आना अभी बाकी है…”  

क्योंकि केके की कलम न रुकती है, न झुकती है — बस हकीकत की स्याही से चटपटा सच लिखती हैं....?

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