सरकारी चावल को एथेनॉल उद्योगों तक पहुंचाने के कथित हजारों करोड़ रुपये के महाघोटाले की जांच अब केवल आर्थिक अपराध का मामला नहीं रह गई है, बल्कि इसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता भी सवालों के घेरे में है। अब तक कार्रवाई कुछ चुनिंदा आरोपियों तक सीमित दिखाई दे रही है, जबकि पूरे नेटवर्क के पीछे प्रभावशाली लोगों की भूमिका को लेकर लगातार चर्चाएं तेज हैं।
जांच एजेंसियों ने कई गिरफ्तारियां की हैं, लेकिन जिन नामों को पूरे नेटवर्क का कथित आधार माना जा रहा है, वे अब भी कानून की पकड़ से बाहर बताए जा रहे हैं। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या जांच किसी दबाव में आगे बढ़ रही है या फिर बड़े चेहरों तक पहुंचने में जानबूझकर देरी की जा रही है।
जानकारी के अनुसार, प्रदेश के कई जिलों में सरकारी चावल को एथेनॉल संयंत्रों तक पहुंचाने का एक व्यापक नेटवर्क सक्रिय था। आरोप है कि सरकारी अनाज को निर्धारित उद्देश्य से हटाकर निजी लाभ के लिए उपयोग किया गया, जिससे शासन को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा।
इधर, जांच के दौरान विभागीय फेरबदल और अधिकारियों के तबादलों ने भी कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया है। विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष है तो पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश होना चाहिए और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या जांच की अगली कड़ी में उन कथित बड़े नामों तक भी कानून पहुंचेगा, जिनकी चर्चा लंबे समय से हो रही है, या फिर कार्रवाई छोटे आरोपियों तक ही सीमित रह जाएगी। प्रदेश की जनता की निगाहें अब जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
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