मंडला, जनवरी 2026।
वर्दी केवल नौकरी नहीं, भरोसे की पहचान होती है। लेकिन जब उसी वर्दी तक पहुंचने के लिए काग़ज़ों में हेराफेरी की आशंका सामने आए, तो सवाल सिर्फ़ कुछ युवाओं पर नहीं—पूरी भर्ती प्रक्रिया पर उठता है। मंडला जिले में पुलिस भर्ती से जुड़ा ताज़ा मामला इसी चिंता को उजागर करता है।
| “पुलिस भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन – प्रतीकात्मक चित्र |
यह मामला वर्ष 2025 में आयोजित पुलिस भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। भर्ती के बाद विभागीय स्तर पर विशेष सत्यापन अभियान के दौरान कुछ अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत शैक्षणिक प्रमाण पत्रों पर संदेह जताया गया। इसके बाद दस्तावेज़ों की विस्तृत जांच शुरू की गई, जिसने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा।
जांच में यह सामने आया कि कुछ मार्कशीट और शैक्षणिक दस्तावेज प्रथम दृष्टया वैध नहीं पाए गए। पुलिस के अनुसार, दस्तावेज़ों के स्रोत और प्रामाणिकता की पुष्टि के लिए प्रशासनिक स्तर पर कदम उठाए गए। इसी क्रम में मऊगंज क्षेत्र से जुड़े एक निजी विद्यालय के रिकॉर्ड की भी जांच हुई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम के मार्गदर्शन में पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की गई। समिति ने विद्यालय के शैक्षणिक रजिस्टर, रिकॉर्ड और प्रस्तुत प्रमाण पत्रों का मिलान किया। समिति की रिपोर्ट में कुछ दस्तावेज़ फर्जी पाए जाने की बात दर्ज की गई। रिपोर्ट के आधार पर मऊगंज थाने में संबंधित अभ्यर्थियों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया गया है। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और सभी पक्षों को सुने जाने के बाद ही निष्कर्ष निकाला जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा व्यवस्था की निगरानी और भर्ती प्रक्रियाओं में सत्यापन प्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। शिक्षा विभाग द्वारा संबंधित विद्यालय की कार्यप्रणाली, रिकॉर्ड और मान्यता से जुड़े पहलुओं की समीक्षा की जा रही है। प्रशासन का कहना है कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर नियमों के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी और उच्च अधिकारियों को आवश्यक प्रतिवेदन भेजा गया है।
पुलिस विभाग का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सर्वोपरि है। यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो जिम्मेदारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही यह भी जांचा जा रहा है कि कहीं यह मामला किसी व्यापक नेटवर्क से तो जुड़ा नहीं है।
यह प्रकरण केवल कुछ काग़ज़ों की वैधता का नहीं, बल्कि उस भरोसे का सवाल है जो आम नागरिक पुलिस और प्रशासन पर करता है। जांच पूरी होने के बाद ही तस्वीर साफ़ होगी कि गलती कहाँ हुई—और भविष्य में ऐसी चूक न हो, इसके लिए सिस्टम क्या सुधार करता है।
रिपोर्टर आपसे पूछता है…
क्या भर्ती जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं में पहले ही स्तर पर कड़े और बहु-स्तरीय दस्तावेज़ सत्यापन अनिवार्य नहीं किए जाने चाहिए, ताकि बाद में ऐसी स्थितियाँ पैदा ही न हों?
अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें।
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