क्या आप जानते हैं?
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115 “स्वेच्छा से चोट पहुँचाना” (Voluntarily Causing Hurt) से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान है। यह धारा उन मामलों में लागू होती है, जहाँ कोई व्यक्ति जानबूझकर या यह जानते हुए कोई ऐसा कार्य करता है, जिससे किसी अन्य व्यक्ति को शारीरिक चोट पहुँचती है।
धारा 115 का सार
धारा 115 के अंतर्गत “चोट” से आशय किसी व्यक्ति के शरीर, मन (मानसिक स्थिति) या स्वास्थ्य को पहुँचे नुकसान से है। यदि कोई व्यक्ति—
इरादतन (जानबूझकर), या
यह ज्ञान रखते हुए कि उसके कार्य से किसी को चोट लग सकती है,
ऐसा कार्य करता है जिससे वास्तव में चोट होती है, तो वह इस धारा के अंतर्गत दोषी माना जा सकता है।
किन परिस्थितियों में धारा 115 लागू होती है?
धारा 115 तब लागू होती है, जब निम्न तत्व मौजूद हों:
1. कार्य का होना – आरोपी द्वारा कोई ठोस कार्य किया गया हो।
2. इरादा या ज्ञान – आरोपी को चोट पहुँचाने का इरादा हो, या उसे यह जानकारी हो कि उसके कार्य से चोट लग सकती है।
3. वास्तविक चोट – पीड़ित व्यक्ति को वास्तविक रूप से चोट पहुँची हो।
उदाहरण
किसी व्यक्ति को गुस्से में थप्पड़ मार देना।
किसी विवाद में जानबूझकर धक्का देना, जिससे सामने वाला गिरकर घायल हो जाए।
पत्थर फेंकना यह जानते हुए कि उससे किसी को चोट लग सकती है।
इन सभी स्थितियों में, यदि चोट सिद्ध होती है, तो धारा 115 लागू हो सकती है।
सजा का प्रावधान
धारा 115 के अंतर्गत दोष सिद्ध होने पर आरोपी को कानून में निर्धारित दंड (जैसे कारावास, जुर्माना या दोनों) से दंडित किया जा सकता है। सजा की प्रकृति और अवधि मामले की गंभीरता, चोट की प्रकृति और परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
क्यों है यह धारा महत्वपूर्ण?
धारा 115 समाज में हिंसा को रोकने और व्यक्तिगत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है। यह संदेश देती है कि किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर या लापरवाही से चोट पहुँचाना कानूनन अपराध है और इसके लिए जवाबदेही तय की जाएगी।
निष्कर्ष
भारतीय न्याय संहिता की धारा 115 एक बुनियादी लेकिन प्रभावी कानूनी प्रावधान है, जो यह सुनिश्चित करता है कि शारीरिक या मानसिक चोट पहुँचाने वाले कृत्यों को हल्के में न लिया जाए। कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि समाज में शांति, अनुशासन और कानून के प्रति सम्मान बनाए रखना भी है।
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