"तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।" — अदम गोंडवी
शाहपुर सुल्तानपुर पंचायत में चाय और नुक्ती का स्टार्टअप तो आपने देख लिया, लेकिन असली 'कॉरपोरेट खेल' तो कंस्ट्रक्शन और मजदूरी के नाम पर चल रहा है। चर्चा है कि पंचायत के खाते से 'श्री कृष्णा कंस्ट्रक्शन' को 40,000 रुपये और 20,000 रुपये के दो भारी-भरकम भुगतान किए गए हैं। लेकिन मजे की बात यह है कि सबूत के तौर पर जो बिल पेश किए गए हैं, वे इतने धुंधले हैं मानो किसी ने दिसंबर के घने कोहरे में बिना फ्लैश के फोटो खींच ली हो। सूत्रों के मुताबिक, बिलों को जानबूझकर ऐसा रखा गया है ताकि न तो तारीख पढ़ी जा सके और न ही फर्म का पूरा विवरण। आखिर यह कैसा निर्माण है जिसके बिल खुद अपनी पहचान छुपाते फिर रहे हैं?
इससे भी बड़ा और चुटीला ड्रामा तो मजदूरी के साइट (पोर्टल) पर चल रहा है। बताने वाले बताते हैं कि पंचायत में गरीबी और अमीरी की परिभाषा ही बदल दी गई है। जिन रसूखदारों के घर पर चार-चार मजदूर परमानेंट काम कर रहे हैं, जिनके विशाल आंगनों में चमचमाते ट्रैक्टर खड़े हैं और जो हर सीजन में क्विंटलों के हिसाब से मंडी में गेहूं बेच रहे हैं... उनका नाम मजदूरी पोर्टल पर 'श्रमिक' के तौर पर दर्ज है! अंदरखाने की खबर है कि यह कागजी मजदूर दिन में ट्रैक्टर की स्टीयरिंग संभालते हैं और रात को फाइलों में फावड़ा चलाते हैं। यह सिस्टम का वह जादुई लूपहोल है जहां अमीर और अमीर हो रहा है, और असली गरीब आज भी काम की तलाश में भटक रहा है।
याद रहे, यह वही ग्राम पंचायत है जहां कुछ समय पहले सड़क और नाली निर्माण में बड़ी अनियमितता पकड़ी गई थी। तब प्रशासन ने कुछ देर के लिए अपनी नींद तोड़ी थी और पंचायत सचिव जयकुमार जैन को निलंबित कर दिया था। साथ ही, सरपंच शोभारानी समेत चार अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस भी थमाया गया था। लेकिन, चर्चा है कि 'कार्रवाई' का यह नाटक सिर्फ जनता को शांत करने का एक लॉलीपॉप था। अपराधी आज भी गांव-गांव बेखौफ घूम रहे हैं और भ्रष्टाचार का मीटर बिना किसी रुकावट के सरपट दौड़ रहा है।
कहानी बिल्कुल साफ है। फाइलों में सब चकाचक है, लेकिन हकीकत में पंचायत के फंड की खुली लूट मची है। सवाल यह है कि आखिर इस 'सिंडिकेट' को किसका संरक्षण प्राप्त है?
केके के सवाल:
- श्री कृष्णा कंस्ट्रक्शन के वो 40 हजार और 20 हजार के 'धुंधले बिल' आखिर किस चीज पर पर्दा डाल रहे हैं?
- क्विंटलों से गेहूं बेचने वाले 'ट्रैक्टर धारी मजदूर' पंचायत की किस साइट पर पसीना बहा रहे हैं?
- पूर्व में हुई निलंबन और नोटिस की कार्रवाई के बाद भी, आखिर किसकी शह पर यह नया खेल धड़ल्ले से खेला जा रहा है?
(Note): इस मामले में जब जनपद सीईओ नीलम रैकवार से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया, तो उनके द्वारा फोन रिसीव नहीं किया गया! (शायद पंचायत के इन 'धुंधले' मामलों और तीखे सवालों से बचने के लिए फिलहाल 'साइलेंट मोड' को ही सबसे सुरक्षित मान लिया गया है।)
और सुनिए... कहानी यहीं नहीं रुकेगी! अगली ख़बर में देखें... सीधे ग्राम पंचायत शाहपुर सुल्तानपुर से एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट... सीधे ग्रामीणों के साथ!
(तैयार रहिए, क्योंकि जब 'खेतों वाले मजदूरों' और 'धुंधले बिलों' का सच गांव की चौपाल पर खुलेगा, तो कई और चेहरे बेनकाब होंगे। जुड़े रहें!)
अंत में दुष्यंत कुमार जी का ये शेर: "यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ, मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।"

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