सिलवानी मुआवजा घोटाला: किसानों का हक डकार गया गब्बर कौन?

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“अरे ओ सांभा… कितने आदमी थे?” — बस फर्क इतना है कि इस बार कहानी रामगढ़ की नहीं, सिलवानी की है… और लूट सोने-चांदी की नहीं, किसानों के हक के 18 करोड़ मुआवज़े की बताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक कागज़ों में पैसा किसानों के नाम निकला, लेकिन रास्ता बदलकर कुछ ऐसे खातों में जा पहुंचा जिनका खेत-खलिहान से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं। चर्चा है कि यह कोई साधारण गलती नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर बैठे कुछ ‘खामोश खिलाड़ी’ हैं, जिनके इशारों पर पूरा खेल हुआ। बताने वाले बताते हैं कि जब मामला खुला तो जांच शुरू हुई, लेकिन हर बार नई टीम आई, फाइलें देखीं और फिर कहानी ठंडी पड़ गई… जैसे किसी ने पर्दे के पीछे से इशारा कर दिया हो—“ज्यादा मत खोदो।” अंदरखाने की खबर ये भी है कि कुछ नाम ऐसे हैं जो सामने आ जाएं तो कई कुर्सियां हिल सकती हैं, इसलिए फाइलें घूम रही हैं और जिम्मेदारियां गायब हैं। उधर जिन किसानों के नाम पर यह पैसा निकला, वे आज भी इंतजार में हैं—सूखी जमीन, खाली जेब और सरकारी वादों के भरोसे। अब सत्ता के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है—आखिर वो ‘गब्बर’ कौन है जिसने किसानों का हक डकार लिया और अब भी बेखौफ घूम रहा है? “हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली…” मगर यहां खामोशी ही सबसे बड़ा शक बन चुकी है… और केके का सवाल — क्या इस कहानी का गब्बर कभी सामने आएगा, या फिर ये 18 करोड़ हमेशा फाइलों के जंगल में खो जाएगा?





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