"लोकायुक्त के डंडे से भी नहीं सुधर रहे अधिकारी — रिश्वतखोरी पर नहीं लग रही लगाम"
भोपाल।
मध्य प्रदेश में एक ओर लोकायुक्त संगठन लगातार भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा है, तो दूसरी ओर सरकारी तंत्र के कुछ अधिकारी अपने पुराने ढर्रे से बाज नहीं आ रहे हैं। हर दूसरे दिन कहीं न कहीं रिश्वत लेते हुए कोई अधिकारी या कर्मचारी लोकायुक्त के जाल में फँस रहा है — लेकिन अफसोस, इससे बाकी सिस्टम में कोई डर दिखाई नहीं देता।
लोकायुक्त की टीमें लगातार कार्रवाई कर रही हैं। कहीं पटवारी पकड़ा जा रहा है, तो कहीं इंजीनियर या क्लर्क — कोई विभाग अछूता नहीं है। इसके बावजूद कुछ अफसर अब भी यह सोचकर बेफिक्र हैं कि “हम तो नहीं फंसे, हमें कौन पकड़ सकता है?”
ऐसे में सवाल उठता है —
क्या प्रदेश के बाकी अधिकारी ये खबरें नहीं पढ़ते?
क्या वे यह नहीं देखते कि कल तक उनके जैसे किसी अफसर की तस्वीर अख़बार की सुर्ख़ियों में थी?
या फिर वे खुद को “दूध का धुला” समझकर इस भ्रांति में हैं कि रिश्वत लेते हुए उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा?
यह सोच ही असली बीमारी है —
जब तक अधिकारी वर्ग के भीतर भय और नैतिकता दोनों नहीं जागेंगे, तब तक लोकायुक्त की कार्रवाईयाँ सिर्फ “खबर” बनकर रह जाएँगी, सुधार का साधन नहीं बन पाएँगी।
सरकार और प्रशासन को अब यह मान लेना चाहिए कि सिर्फ पकड़ने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा —
जरूरत है सिस्टम में ईमानदारी को प्रतिष्ठा देने की, ताकि अधिकारी “रिश्वत लेकर पकड़े जाने” से नहीं, बल्कि “ईमानदारी से काम करने” पर गर्व महसूस करें।
डिस्क्लेमर:
यह सामग्री जनहित में प्रकाशित है और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों व सामान्य प्रवृत्तियों पर आधारित है। किसी भी अधिकारी या व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से आरोपित या लक्षित करने का उद्देश्य नहीं है।
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