"तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा, मुझे रहज़नों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।" : मजरूह सुल्तानपुरी
महात्मा गांधी ने कभी एक सपना देखा था— 'ग्राम स्वराज' का। बापू सोचते थे कि गांव अपने फैसले खुद लेंगे, विकास की बयार गांव की चौपालों से बहेगी। लेकिन, रायसेन जिले की बेगमगंज तहसील के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत 'शाहपुर सुल्तानपुर' की हवाओं में आजकल एक अलग ही खुशबू तैर रही है। यह खुशबू विकास की कम और कथित भ्रष्टाचार की 'नुक्ती' की ज्यादा लग रही है। जिले के गलियारों में चर्चा है कि ग्राम पंचायतों से लेकर जनपद पंचायतों तक भ्रष्टाचार का भस्मासुर अब दिन-दूनी और रात-चौगुनी गति से बढ़ रहा है, और ऊपर बैठे साहबों को 'प्रशासनिक मोतियाबिंद' हो गया है। उन्हें सब कुछ 'टेंशन फ्री' और हरा-ही-हरा नजर आ रहा है।
पंचायत दर्पण के बिल वाउचर की मानें, तो शाहपुर सुल्तानपुर में गजब का ही मैनेजमेंट चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस पंचायत में देशभक्ति का जज्बा इतना कूट-कूट कर भरा है कि 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) के नाम पर कटे एक कथित बिल में सीधे 6,100 रुपये की नुक्ती (मिठाई) बांट दी गई। अब सवाल यह है कि इतनी नुक्ती आखिर बांटी किसे गई? क्या पूरा गांव इस नुक्ती को खाकर 'ग्राम स्वराज' के नशे में झूम रहा था, या फिर यह मिठास सिर्फ कुछ चुनिंदा फाइलों और जेबों तक ही सीमित रह गई? सामान्य प्रक्रिया से परे जाकर जिस तेजी से यह बिल पास हुए, वह किसी रहस्य से कम नहीं है।
कहानी सिर्फ नुक्ती पर खत्म नहीं होती। बताने वाले बताते हैं कि पंचायत में आयोजित एक कृषि मेले में 'चाय-पानी और नाश्ते' के नाम पर 6,500 रुपये स्वाहा कर दिए गए। जिले के कॉफी हाउस वाले भी इस बिल को देखकर डिप्रेशन में आ सकते हैं! आखिर ऐसी कौन सी 'स्पेशल चाय' पिलाई गई जिसमें इतने हजार उड़ गए? क्या चाय की पत्तियों में सोने का वर्क मिलाया गया था? अंदरखाने के सिस्टम का संकेत तो यही है कि प्रशासन की मूक सहमति के बिना इतनी बड़ी दावत फाइलों में हजम नहीं हो सकती।
ग्राम पंचायत के ये कथित खर्चे चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि लीपापोती का ऐसा बेजोड़ काम शायद ही कहीं और देखने को मिले। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और अधिकारी फाइलों पर आंखें मूंद कर हस्ताक्षर करने लगें, तो ऐसे ही 'चाय-नुक्ती' वाले चमत्कार होते हैं।
अगले पार्ट का ट्रेलर: पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त! अगर आपको लग रहा है कि खेल सिर्फ चाय और नुक्ती का है, तो आप गलत हैं। अगले पार्ट में हम खोलेंगे 'एक कंस्ट्रक्शन' के उन धुंधले बिलों का राज़, जिन्हें देखकर बड़े-बड़े सीआईडी वाले चकरा जाएं। साथ ही, पर्दा उठेगा उन 'अमीर मजदूरों' से, जिनके आंगन में ट्रैक्टर खड़े हैं, लेकिन फाइलों में वो फावड़ा चला रहे हैं!
अब केके के सवाल:
- 26 जनवरी को 6,100 रुपये की 'रहस्यमयी नुक्ती' आखिर किस-किस ने खाई?
- कृषि मेले में 6,500 रुपये की चाय किस वीआईपी के गले से उतरी, या सिर्फ कागजों की प्यास बुझाई गई?
- क्या मोतियाबिंद धारी अधिकारियों को इन कथित बिलों की मिठास और चाय की चुस्की का स्वाद नहीं मिल रहा?
अंत में अकबर इलाहाबादी की ये शायरी: "जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नहीं होते,सज़ा न दे के अदालत बिगाड़ देती है।"

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