तीन बेदखली आदेश बेअसर: मंडला में वृद्धा को नहीं मिला रास्ता

मंडला के अंजनिया में शासकीय रास्ते पर अवैध कब्जे से परेशान वृद्धा
पीड़ित 

 70 वर्षीय वृद्धा का सवाल—आख़िर प्रशासन किसका इंतज़ार कर रहा है?

मंडला / जब एक 70 साल की बुज़ुर्ग महिला बार-बार जनसुनवाई के दरवाज़े पर दस्तक दे और फिर भी उसे अपने ही घर तक पहुँचने का रास्ता न मिले—तो सवाल सिर्फ कब्जे का नहीं, व्यवस्था की संवेदनशीलता का होता है।

विवाद रास्ते का

यह मामला है के अंतर्गत के पास अहमदपुर गांव का।
पीड़िता हैं 70 वर्षीय फांफा बाई साहू, जो पिछले कई महीनों से प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं—सिर्फ इसलिए कि उनके घर के सामने का शासकीय रास्ता उन्हें वापस मिल सके।

मामला कब का है?

यह विवाद बीते कई महीनों से चला आ रहा है, लेकिन ताज़ा घटनाक्रम 6 जनवरी का है, जब फांफा बाई एक बार फिर कलेक्टर कार्यालय की जनसुनवाई में पहुँचीं और लिखित आवेदन सौंपा।

आरोप क्या है?

फांफा बाई का कहना है कि उनके घर के सामने स्थित शासकीय रास्ते पर कुंजबिहारी साहू और उसके परिवार ने अवैध कब्जा कर लिया है।
इस कब्जे के कारण—

  • उनके परिवार का आवागमन बाधित हो गया है
  • घर तक पहुँचने का रास्ता बेहद संकरा हो गया है
  • रोज़मर्रा की ज़िंदगी में असुरक्षा और डर का माहौल बन गया है

आदेश हुए, कार्रवाई नहीं

सबसे गंभीर सवाल यहीं से उठता है।
पीड़िता के अनुसार—

  • नायब तहसीलदार अंजनिया द्वारा अतिक्रमण हटाने के आदेश जारी किए गए
  • एसडीएम स्तर से भी बेदखली वारंट निकाले गए
  • कुल तीन बार बेदखली आदेश जारी हुए

इसके बावजूद, ज़मीनी हकीकत यह है कि कब्जा आज भी जस का तस बना हुआ है।
अंतिम आदेश के अनुसार 5 जनवरी को अतिक्रमण हटना था, लेकिन समाचार लिखे जाने तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

धमकियों का आरोप

फांफा बाई ने अपने आवेदन में यह भी उल्लेख किया है कि उन्हें और उनके परिवार को लगातार डराया-धमकाया जा रहा है।
उनके पुत्र रामप्रसाद को नौकरी से हटवाने की धमकी देने और मारपीट की आशंका जताई गई है।
इन आरोपों की पुष्टि प्रशासनिक रिकॉर्ड और आवेदन के माध्यम से सामने आई है, जिन पर कार्रवाई की ज़िम्मेदारी प्रशासन की है।

अब क्या आश्वासन मिला?

6 जनवरी को जनसुनवाई में आवेदन देने के बाद प्रशासन की ओर से 7 जनवरी को अतिक्रमण हटाने का आश्वासन दिया गया है।
यह आश्वासन कलेक्टर स्तर से मिलने की बात कही जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि—
क्या यह आश्वासन भी पहले के आदेशों की तरह फाइलों में ही सिमट जाएगा?

सवाल व्यवस्था से

जब तीन-तीन वैधानिक आदेशों के बाद भी एक वृद्धा को न्याय न मिले, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की समस्या नहीं रह जाती—यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सीधा सवाल बन जाता है।


रिपोर्टर आपसे पूछता है…

क्या प्रशासनिक आदेशों का असर तभी होता है, जब पीड़ित प्रभावशाली हो?
या फिर फांफा बाई जैसी आम बुज़ुर्ग महिलाओं को न्याय के लिए ऐसे ही दर-दर भटकना पड़ेगा?

👇 आपकी राय क्या है? कमेंट में जरूर लिखें।

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