श्री प्रकाश शुक्ला: वो माफिया जिसने मुख्यमंत्री की सुपारी ली और जिसके खौफ ने जन्म दिया 'STF' को

 



1. प्रस्तावना: 'सेकंड शिकागो' का उदय और गोरखपुर का अंतर्विरोध


उत्तर प्रदेश का गोरखपुर शहर, जो बाबा गोरखनाथ की तपोभूमि और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है, 1990 के दशक में एक भयावह बदलाव का गवाह बना। उस दौर में यहां अपराध की दर इस कदर बढ़ी कि इसे 'सेकंड शिकागो' (Second Chicago) कहा जाने लगा था। इसी रक्तरंजित माहौल से उपजा एक ऐसा नाम, जिसने न केवल सत्ता की चूलें हिला दीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और बिहार के गलियारों में मौत का सन्नाटा पसार दिया। यह कहानी है श्री प्रकाश शुक्ला की—एक ऐसा माफिया जिसने न केवल बाहुबलियों को धूल चटाई, बल्कि सीधे सूबे के मुख्यमंत्री की जान की कीमत लगा दी।



2. पहलवानी से कत्ल तक: एक अपराधी का जन्म


6 अक्टूबर 1973 को जन्में शिव प्रकाश (बाद में श्री प्रकाश) का अपराधी बनने का कोई इरादा नहीं था। उसके पिता एयरफोर्स में अधिकारी थे और उन्होंने श्री प्रकाश का दाखिला एक महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूल में कराया था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। चौड़ी छाती और मजबूत कद-काठी वाले श्री प्रकाश पर पहलवानी का भूत सवार था और वह अखाड़ों का चर्चित चेहरा बन चुका था।


साल 1993 में उसकी जिंदगी में वो मोड़ आया जिसने एक पहलवान को हत्यारा बना दिया। उसकी बहन के साथ गांव के ही राकेश तिवारी ने छेड़खानी की थी। जब यह बात 20 साल के श्री प्रकाश को पता चली, तो उसका 'पहलवानी खून' उबाल मारने लगा। उसने राकेश को तब तक पीटा जब तक उसकी जान नहीं निकल गई। इस पहले खून ने उसे पुलिस की नजरों में ला दिया, लेकिन इलाके के बाहुबली हरिशंकर तिवारी ने उसे संरक्षण देकर बैंकॉक भेज दिया। जब वह लौटा, तो उसके इरादे और भी खतरनाक हो चुके थे।




3. "ओवरकिल" की सनक: दहशत फैलाने का खूनी 'हस्ताक्षर'


श्री प्रकाश शुक्ला केवल मारता नहीं था, वह शरीर को छलनी कर देता था। अपराध की दुनिया में इसे "ओवरकिल" (Overkill) कहा जाता है। वह चाहता था कि उसके नाम का ऐसा 'भौकाल' (Bhaukaal) जमे कि पुराने दिग्गज भी उसे 'नौसिखिया' समझने की भूल न करें। उसने लखनऊ के लॉटरी व्यवसायी विवेक श्रीवास्तव पर 80 गोलियां बरसाईं। वहीं, अपने दुश्मन और बाहुबली विधायक वीरेंद्र प्रताप शाही पर 105 गोलियां दागकर उन्हें बीच बाजार खत्म कर दिया। यह क्रूरता उसकी सोची-समझी रणनीति थी।


"अपराध की दुनिया में 'अमर' होने की सनक उस पर इस कदर हावी थी कि एक तांत्रिक के कहने पर उसने 101 हत्याएं करने की कसम खाई थी। मारे जाने से पहले तक वह 86 लोगों की जान ले चुका था।"


उसने बिहार के कद्दावर मंत्री बृज बिहारी प्रसाद को भी पटना के अस्पताल के भीतर भारी सुरक्षा के बीच AK-47 से भून डाला था। इस दुस्साहस ने राज्य सरकार को हिलाकर रख दिया था।




4. बिना चेहरे वाला आतंक: सुनील शेट्टी के स्केच की कहानी


श्री प्रकाश के खौफ का आलम यह था कि पुलिस के पास उसकी कोई हालिया तस्वीर नहीं थी। उसने सरेआम धमकी दी थी कि जो भी उसकी फोटो पुलिस को देगा, उसे 24 घंटे में मार दिया जाएगा। एसटीएफ के हाथ अंततः उसकी भांजी के जन्मदिन की एक पुरानी फटी हुई फोटो लगी। चूंकि श्री प्रकाश की शक्ल बॉलीवुड अभिनेता सुनील शेट्टी से काफी मिलती-जुलती थी, इसलिए पुलिस ने एक अनूठी युक्ति अपनाई। उन्होंने सुनील शेट्टी की बॉडी पर श्री प्रकाश का चेहरा लगाकर एक स्केच तैयार किया और उसे पूरे राज्य में जारी कर दिया।


5. जब सत्ता कांप उठी: मुख्यमंत्री की 6 करोड़ की सुपारी


श्री प्रकाश शुक्ला का दुस्साहस तब अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया जब खबर आई कि उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या के लिए 6 करोड़ रुपये की सुपारी ली है। भारतीय इतिहास में यह पहला मौका था जब कोई माफिया सीधे राज्य की सर्वोच्च सत्ता को चुनौती दे रहा था। इस खबर ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया।


6. एसटीएफ (STF) का जन्म: एक अपराधी के लिए बनी विशेष यूनिट


मुख्यमंत्री की सुरक्षा को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। उत्तर प्रदेश में पहली बार 'स्पेशल टास्क फोर्स' (STF) का गठन किया गया। अजय राज शर्मा, अरुण कुमार और राजेश पांडे जैसे जांबाज अधिकारियों के नेतृत्व में यह यूनिट खास तौर पर श्री प्रकाश शुक्ला के खात्मे के लिए बनाई गई थी। यह भारत में अपनी तरह की पहली पुलिस यूनिट थी जिसे केवल एक अपराधी के एनकाउंटर के लिए गठित किया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, सरकार ने केवल उसे पकड़ने के लिए उस समय लगभग 1 करोड़ रुपये खर्च किए थे।


7. प्यार, तकनीक और वो आखिरी चूक


श्री प्रकाश तकनीक का माहिर खिलाड़ी था। वह पुलिस को चकमा देने के लिए 14 सिम कार्ड और क्लोन किए हुए फोन का इस्तेमाल करता था। वह दिल्ली के वसंत कुंज में छिपकर अपना साम्राज्य चला रहा था। पुलिस को पहली बड़ी लीड तब मिली जब उसने लखनऊ के एक बिल्डर से प्रति फ्लैट ₹500 की रंगदारी मांगी।


शातिर होने के बावजूद, उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसकी प्रेमिका बनी, जो गाजियाबाद में रहती थी। वह उससे घंटों फोन पर बात करता था और हर दिन करीब ₹5000 फोन कॉल पर खर्च कर देता था। इसी तकनीकी निगरानी (Surveillance) ने पुलिस को उसका सुराग दिया।


22 सितंबर 1998 को जब वह गाजियाबाद के मोहन नगर फ्लाईओवर पर अपनी नीली सिएलो कार में था, एसटीएफ ने उसे घेर लिया। भागने की कोशिश में उसने पीछा कर रहे आईपीएस राजेश पांडे को फोन पर सपरिवार जान से मारने की धमकी दी, लेकिन जांबाज अफसरों ने हार नहीं मानी। करीब 1 किलोमीटर के पीछा करने के बाद, पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। जवाबी फायरिंग में पुलिस ने 45 गोलियां चलाईं और 25 साल के इस खूंखार माफिया का अंत कर दिया।




8. निष्कर्ष: अपराध के अंत का सबक


श्री प्रकाश शुक्ला का उदय जितनी तेजी से हुआ, उसका अंत उतना ही वीभत्स था। उसकी कहानी इस कड़वे सच को पुख्ता करती है कि अपराध की उम्र बहुत छोटी होती है। जिस तकनीक और मोबाइल फोन के जरिए उसने दहशत का साम्राज्य खड़ा किया था, अंततः वही फोन उसकी मौत का कारण बना।


अंतिम विचार: श्री प्रकाश शुक्ला जैसे अपराधी अक्सर 'अमर' होने की चाहत में खूनी खेल खेलते हैं, लेकिन क्या इतिहास में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है? कानून की ताकत और समय का चक्र हमेशा यह साबित करता है कि चाहे माफिया कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसका अंत हमेशा कानून के हाथों ही होता है। क्या अपराध की दुनिया में 'अमर' होने की चाहत हमेशा इसी तरह के वीभत्स अंत की ओर ले जाती है?

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