प्रदेश में सच बोलना अपराध क्यों बनता जा रहा है?(एक सवाल, जो सत्ता के दरवाज़े तक पहुँचना चाहिए)

“राजनीतिक/प्रशासनिक जवाबदेही और प्रेस स्वतंत्रता संबंधी विचार”
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठते सवालों के संदर्भ में।




प्रदेश में सच बोलना अपराध क्यों बनता जा रहा है?
(एक सवाल, जो सत्ता के दरवाज़े तक पहुँचना चाहिए)

पूरा प्रदेश आज एक असहज सच्चाई से गुजर रहा है।
यह वह सच्चाई है जिसे नकारा तो जा सकता है,
लेकिन मिटाया नहीं जा सकता।
जब भी कहीं व्यवस्था की लापरवाही उजागर होती है,
जब भी कहीं सवाल उठते हैं,
जब भी कोई आवाज़ सच के साथ खड़ी होती है—
तो सबसे पहले वही आवाज़ दबाई जाती है।
यह स्थिति अब किसी एक ज़िले, एक घटना या एक पेशे तक सीमित नहीं रही।
यह प्रदेश-व्यापी चिंता बन चुकी है।
पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और सवाल पूछने वाले नागरिक—
इन सबके सामने आज एक ही सवाल है:
क्या सवाल पूछना अब असहज माना जाने लगा है?
यह लेख किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं है।
यह नीति, व्यवस्था और प्राथमिकताओं पर सवाल है।
प्रदेश की जनता यह जानना चाहती है कि:
क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गई है?
क्या जवाबदेही से बचने का सबसे आसान तरीका आवाज़ को दबाना बन गया है?
और क्या यह स्थिति लोकतंत्र के मूल भाव के खिलाफ नहीं जाती?
मुख्यमंत्री प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख होते हैं।
उनका दायित्व केवल प्रशासन चलाना नहीं,
बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि
जनता की आवाज़ सुरक्षित रहे।
जब पूरे प्रदेश से ऐसे सवाल उठने लगें,
तो उन्हें “आलोचना” नहीं,
चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए।
यह लेख किसी के खिलाफ नहीं,
बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में है।
प्रदेश को आज बयान नहीं,
संवेदनशील नेतृत्व और स्पष्ट संदेश चाहिए— कि सवाल पूछना अपराध नहीं है,
और सच दिखाना किसी की दुश्मनी नहीं।
इतिहास बहुत स्पष्ट होता है।
वह यह नहीं देखता कि सत्ता में कौन था,
वह यह दर्ज करता है कि
सत्ता के समय आवाज़ों के साथ कैसा व्यवहार हुआ।

नोट :- यह लेख लेखक के निजी विचारों पर आधारित है।

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