जहाँ आवश्यक वस्तुएँ नहीं बनतीं, वहाँ केवल बाजार लगता है

जहाँ आवश्यक वस्तुएँ नहीं बनतीं, वहाँ केवल बाजार लगता है

लेख : रघुवीर अहरवाल

सिवनी | 21 दिसंबर 2025

देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबार में हाल ही में यह समाचार प्रमुखता से प्रकाशित हुआ कि “भारत दुनिया का सबसे आकर्षक बाजार बन गया है।” 

लेकिन इतिहास और अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से इस कथन पर गंभीर मंथन आवश्यक है। सच यह है कि बाजार वहीं बनता है, जहाँ जीवन की आवश्यक वस्तुओं का स्वयं उत्पादन नहीं होता।

लेखक रघुवीर अहरवाल के अनुसार, ईसा पूर्व लगभग 200 वर्षों तक भारत में बौद्ध राजाओं का शासन रहा। सम्राट अशोक महान से लेकर बृहदृथ तक के काल में भारत ने शिल्पकला, विज्ञान, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन मार्गों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। उस समय भारत में निर्मित वस्तुएँ गुणवत्ता के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध थीं।

बौद्ध राजाओं की नीति भारत में बने उत्पादों को विदेशों तक पहुँचाने की थी। इसी नीति के कारण भारत उस समय केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादन और निर्यात का केंद्र था।

लेख में यह भी उल्लेख है कि बौद्ध शासन के बाद सत्ता में आए शासकों ने इन नीतियों को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया। परिणामस्वरूप देश में जीवनोपयोगी वस्तुओं का उत्पादन कम होता गया, जिससे विदेशी व्यापार भी प्रभावित हुआ।

पिछले लगभग दो हजार वर्षों में भारत में आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन में आई कमी ने विदेशी व्यापारियों के लिए यहाँ अपने उत्पाद बेचने का रास्ता खोल दिया। आज भारत बड़ी मात्रा में विदेशी वस्तुओं की खपत करने वाला देश बन चुका है और धीरे-धीरे विदेशी उत्पादों का बड़ा बाजार बनता जा रहा है।

लेख में यह भी कहा गया है कि देश के बड़े पूंजीपति घराने अधिक लाभ के लिए विदेशी उत्पादों को भारतीय बाजार में खपाने में लगे हैं, जबकि स्वदेशी उत्पादन को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा। स्वदेशी अपनाओ जैसे नारे व्यवहार में कमजोर पड़ते नजर आते हैं।

आज देश के बाजार विदेशी वस्तुओं से भरे हुए हैं। अमेरिकी डॉलर का मूल्य लगभग 90 रुपये तक पहुँच जाना देश की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है। यह दर्शाता है कि भारत उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर उपभोग आधारित बाजार बनता जा रहा है।

लेख के अनुसार, यदि भारत को वास्तव में मजबूत बनाना है, तो उसे पुनः स्वदेशी उत्पादन, आत्मनिर्भरता और निर्यात-मुखी नीति अपनानी होगी। केवल एक बड़ा बाजार बन जाना किसी भी राष्ट्र की आर्थिक सफलता का मापदंड नहीं हो सकता।


अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। वेबसाइट या संपादकीय मंडल का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

إرسال تعليق

0 تعليقات

Copyright (c) 2020 abhaywani All Right Reseved